बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

5 टिप्‍पणियां:

  1. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी।

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  2. चाँदनी रात मेँ एक शर्मिली सी किरण।
    आँख मिचौली करती बादल के ओट मे जा छुपी॥
    हम ढ़ूढ़ते रह गये इधर-उधर सारे जहाँ मेँ।
    हमें आज तक तलाश है परन्तु मिल न सकी॥
    ॰सनुक यादव

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  3. चाँदनी रात मेँ एक शर्मिली सी किरण।
    आँख मिचौली करती बादल के ओट मे जा छुपी॥
    हम ढ़ूढ़ते रह गये इधर-उधर सारे जहाँ मेँ।
    हमें आज तक तलाश है परन्तु मिल न सकी॥
    ॰सनुक यादव

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  4. चाँदनी रात मेँ एक शर्मिली सी किरण।
    आँख मिचौली करती बादल के ओट मे जा छुपी॥
    हम ढ़ूढ़ते रह गये इधर-उधर सारे जहाँ मेँ।
    हमें आज तक तलाश है परन्तु मिल न सकी॥
    ॰सनुक यादव

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  5. चाँदनी रात मेँ एक शर्मिली सी किरण।
    आँख मिचौली करती बादल के ओट मे जा छुपी॥
    हम ढ़ूढ़ते रह गये इधर-उधर सारे जहाँ मेँ।
    हमें आज तक तलाश है परन्तु मिल न सकी॥
    ॰सनुक यादव

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