रविवार, 14 नवंबर 2021

✍️ छुने दो आसमान✍️

       ✍️ छुने दो आसमान✍️

नदिया झूमे झरने गाते, पवन मंद मंद मुस्कुराते हैं।

शस्यशालिनी धरती में, भौरें गुन गुन गाते हैं।

सौंधी मिट्टी की खुशबू,है चंदन के समान

मन करता है आज ,मैं छू लू आसमान ।


पपीहा गाते  मोर नाचे,मधुर उपवन मतवाला है।

सरसराती सावन बरसे ,मानो मधुरस प्याला है।।

गड़गड़ाती बादल गरजे,दमकती दामिनी लाली है।

दादुर अपना कंठ खोलें ,जब होती रात मतवाली है।।

बलखाती नदियाॅ झुमें,विकराल गति अनजान।

मन करता है आज ,मैं छू लू आसमान ।

                          ✍️सनुक लाल यादव

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

राधा के मोहन

 *राधा  के  मोहन*


राधा  के  मोहन कान्हा,

प्रेम  के  तुम  सागर हो।

अखिल चराचर में समाए,

अमृत  से भरे  गागर  हो।।


चौंसठ कलाओं का आधार,

 गीता  का  विरासत  हो। 

कृष्णम् वंदे जगत गुरुम्,

महाभारत का सियासत हो।।


यशोदा के नन्दलाला,

देवकी के दुलारा हो।

मधुबन में रास रचाते,

गोपियों के ग्वाला हो।।


 सूर के मधुर संगीत, 

मीरा के वीणा तार हो।

योगियों की भक्ति तुम,

 प्रेमियों के श्रृंगार हो।।


 ब्रह्मांड के अधिष्ठाता तुम,

 चराचर के स्वामी हो।

तुम ही तो एक हो मोहन,

 सभी के उर अंतर्यामी हो।।


✍🏻रचना - सनुक लाल यादव, 

            बालाघाट मध्य प्रदेश

🪔दीपोत्सव🪔

 🪔दीपोत्सव🪔


रोज बोल मीठे बोल,

हर शब्द तोल मोल।

प्रेम भाव तो जगाइए,

स्नेह भाव साजकर।

हर हिय में राज कर,

रोज दीपोत्सव मनाइए।


आकाश सा ऊंचा मन,

चंद्रमा सा शीतल जीवन।

संतप्त कर हिय को,

औरों को शीतल बनाइए।


जीवन हो समरस,

पीड़ित ना हो कोई बस।

इतनी सी बात को ,

हमेशा ध्यान में बसाइए।



श्रीराम को याद कर,

 तिमिर का नाश कर।

त्यागमय जीवन कर,

पथानुगामी बन जाइए।


रोज बोल मीठे बोल,

हर शब्द तोल मोल।

प्रेम भाव तो जगाइए,

स्नेह भाव साजकर।

हर हिय में राज कर,

रोज दीपोत्सव मनाइए।



✍️सनुक लाल यादव

   बालाघाट मध्य प्रदेश🪔

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

*भाषा मेरी हिंदी*

          *भाषा मेरी हिंदी*
राष्ट्र मेरा हिंदुस्तान है, 
भाषा मेरी   हिंदी।
भारत की पहचान है,
सबके माथे की बिंदी।।

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम,
कच्छ मेघालय मिजोरम तक।
गंगोत्री यमुनोत्री हिमालय,
महाबली रामेश्वरम तक।।
सर्व भाषा में निहित, 
गुजराती मराठी सिंधी।
राष्ट्र मेरा हिंदुस्तान है,
भाषा मेरी हिंदी।।


शहर नगर हर डगर-डगर,
दिग-दिगंतर की भाषा।
जन मन में जन गण मन में,
जन-जन की आशा।।
सुमधुर पतित पावन,
सरस बहती कालिंदी।
राष्ट्र मेरा हिंदुस्तान है, 
भाषा मेरी हिंदी।।

वीरता शौर्य भक्ति यश ,
भारत मां का वंदन हो।
राम कृष्ण की जीवन गाथा,
कवि हृदय का स्पन्दन हो।।
साहित्य कला इतिहास का,
अक्षय नीरनिधि
राष्ट्र  मेरा  हिंदुस्तान है, 
भाषा  मेरी  हिंदी।।

                  ✍️  सनुक लाल यादव

                     बालाघाट मध्य प्रदेश

💐बसंत बयार💐

 💐बसंत बयार💐


मुस्कुरा रहीं हैं कलियाँ,कोपलों की आड़ में ।

झूम रहीं हैं डालियाँ,मादक बसंत बयार में ।।


महुएँ की महक से,पवन मदहोश।

आम के झुरमुट से,कोयल का संघोष।

सुहानी भोर लाये,सौन्धीं किरण लाली ।

शबनम की बूंदो से,लदी गेंहूँ की बाली।

बलखा रहीं हैं नदियाँ,अमृत - सी धार ले....

झूम रहीं हैं डालियाँ,मादक बसंत बयार में ।।


सुहाना मौसम में,प्यारा मेरा गाँव ।

पायल की संगीत से,थीरके जहाॅ पाँव ।

टेशू के फूल से,पेड़ जो दहकता।

नयनाभिराम में,नज़र नहीं हटता।

झर रहीं पिचकारियाँ,राग मल्हार ले...

झूम रहीं हैं डालियाँ,मादक बसंत बयार में ।।


लदे वल्लरी फूल से,लगे जैसे हार ।

सौंधीं महक से,मचलता पहाड ।

चारों दिशाएँ आज,मस्त हैं मदमात।

पहुँची है देखो,बसंत की बारात।

रंगीन हो गई धरती,रंगो की बौछार में....

झूम रहीं हैं डालियाँ,मादक बसंत बयार में ।।

            *रचनाकार*

✍🏻सनुक लाल यादव ✍🏻

✍🏻शिक्षा और संस्कार ✍🏻

✍🏻शिक्षा और संस्कार ✍🏻

हूँ मैं सरल लेकिन,इतना आसान नहीं ।
शिक्षा और संस्कार हूँ,दूसरा कोई पहचान नहीं ।।


श्रीराम का विश्वमित्र,तो गुरू वशिष्ट की वाणी हूँ ।
श्रीकृष्णा की सांदीपनी,और द्रोण की कहानी हूँ ।।
ममतामयी माटी के,रग-रग में संस्कार बसा ।
सदाचार और सदविचार का,करता संचार सदा ।।
वीर सहासी सुरता हूँ,कायरता का निशान नहीं ।
शिक्षा और संस्कार हूँ,दूसरा कोई पहचान नहीं ।।


पतित पावन ज्ञान की,त्रिवेणी रसधार हूँ ।
कालिदास कौटिल्य और,आर्यभट्ट का विचार हूँ ।।
सामवेद का नादभेद,सात स्वर का झंकार हूँ ।
ऋग्वेद की  ऋचा और,मैं ही ब्रम्हज्ञान हूँ ।।
सत्य अहिंसा और मानवता हूँ,शुक्र का संस्कार नहीं ।
शिक्षा और संस्कार हूँ,दूसरा कोई पहचान नहीं ।।


                         ✍️ सनुक लाल यादव
                              बालाघाट मध्य प्रदेश

राधा के मोहन

 *राधा  के  मोहन*


राधा  के  मोहन कान्हा,

प्रेम  के  तुम  सागर हो।

अखिल चराचर में समाए,

अमृत  से भरे  गागर  हो।।


चौंसठ कलाओं का आधार,

 गीता  का  विरासत  हो। 

कृष्णम् वंदे जगत गुरुम्,

महाभारत का सियासत हो।।


यशोदा के नन्दलाला,

देवकी के दुलारा हो।

मधुबन में रास रचाते,

गोपियों के ग्वाला हो।।


 सूर के मधुर संगीत, 

मीरा के वीणा तार हो।

योगियों की भक्ति तुम,

 प्रेमियों के श्रृंगार हो।।


 ब्रह्मांड के अधिष्ठाता तुम,

 चराचर के स्वामी हो।

तुम ही तो एक हो मोहन,

 सभी के उर अंतर्यामी हो।।


✍🏻रचना - सनुक लाल यादव, 

            बालाघाट मध्य प्रदेश