*राधा के मोहन*
राधा के मोहन कान्हा,
प्रेम के तुम सागर हो।
अखिल चराचर में समाए,
अमृत से भरे गागर हो।।
चौंसठ कलाओं का आधार,
गीता का विरासत हो।
कृष्णम् वंदे जगत गुरुम्,
महाभारत का सियासत हो।।
यशोदा के नन्दलाला,
देवकी के दुलारा हो।
मधुबन में रास रचाते,
गोपियों के ग्वाला हो।।
सूर के मधुर संगीत,
मीरा के वीणा तार हो।
योगियों की भक्ति तुम,
प्रेमियों के श्रृंगार हो।।
ब्रह्मांड के अधिष्ठाता तुम,
चराचर के स्वामी हो।
तुम ही तो एक हो मोहन,
सभी के उर अंतर्यामी हो।।
✍🏻रचना - सनुक लाल यादव,
बालाघाट मध्य प्रदेश
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